शून्य से शिखर: चने बेचने से ‘धोती वाला बाबा’ बनने तक की गाथा

Shiv Shankar Journey
April 21, 2026
Shiv Shankar Tirth Yatra

अंतरराष्ट्रीय क्षितिज पर भारतीय संस्कृति का शंखनाद

“मंजिलें उन्हीं को मिलती हैं, जिनके सपनों में जान होती है, पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है।”

सफलता की चमक अक्सर हमें चकाचौंध कर देती है, लेकिन उस चमक के पीछे छिपे अंधेरे और संघर्ष की रातों को कम ही लोग देख पाते हैं। देवभूमि ऋषिकेश के आध्यात्मिक आकाश में ‘धोती वाला बाबा’ के नाम से विख्यात लाला शिवचरण लाल अग्रवाल जी का जीवन इसी सत्य का जीवंत प्रमाण है। यह एक ऐसे साधारण मनुष्य की असाधारण यात्रा है जिसने अभावों के ‘शून्य’ से शुरू होकर सेवा के ‘शिखर’ को स्पर्श किया।

विधाता की अग्निपरीक्षा: संघर्ष की भट्टी में तपा बचपन

22 दिसंबर 1932 को राजस्थान के हिंडौन सिटी की मिट्टी में एक ऐसे बालक ने जन्म लिया, जिसे नियति ने संघर्षों की आग में तपाकर कुंदन बनाने का निर्णय ले लिया था। शिवचरण जी का बचपन खिलौनों से नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों के बोझ से शुरू हुआ। घर की आर्थिक स्थिति ऐसी थी कि दो वक्त की रोटी भी एक बड़ी चुनौती थी। पिता की छोटी सी दुकान परिवार की नैया पार लगाने में असमर्थ थी। रिश्तेदारों के तीखे वचनों और घोर गरीबी ने उनके भीतर एक ऐसी तड़प पैदा की, जिसने उन्हें अपना घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया।

ऋषिकेश का वो फुटपाथ: जहाँ ‘धैर्य’ की नींव पड़ी

वर्ष 1959 में, जब वे पहली बार ऋषिकेश की पावन भूमि पर उतरे, तो उनके पास न तो सिर छुपाने को छत थी और न ही जेब में पूंजी। उनके पास था तो केवल अपनी धर्मपत्नी, श्रीमती संपत्ति देवी का अटूट साथ और ईश्वर पर अडिग विश्वास। लक्ष्मण झूला मार्ग पर वे बंदरों को खिलाने के लिए चने बेचने लगे। कल्पना कीजिए उस दृश्य की—एक स्वाभिमानी पुरुष दिन भर चने की टोकरी लेकर गलियों में घूमता और रात ढलने पर भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के ठंडे चबूतरे को अपना आशियाना बनाता। वह चबूतरा उनके संघर्ष के आंसुओं का गवाह भी था और उनके फौलादी इरादों का पालना भी।

‘श्री शिव शंकर तीर्थ यात्रा’: जब सेवा ही व्यापार बन गई

शिवचरण जी के जीवन में बड़ा मोड़ तब आया जब उन्होंने अनुभव किया कि तीर्थयात्री श्रद्धा लेकर आते तो हैं, लेकिन उचित व्यवस्थाओं के अभाव में भटक जाते हैं। 1962 में उन्होंने एक छोटा सा पुस्तक स्टाल शुरू किया, लेकिन उनके मन में कुछ बड़ा करने की तड़प थी—कुछ ऐसा जिससे लोगों की दुआएं मिलें। 1967 में उन्होंने ‘श्री शिव शंकर तीर्थ यात्रा‘ की नींव रखी। उनका उद्देश्य धनार्जन कभी था ही नहीं। वे अक्सर कहते थे, “श्रद्धालु जब भगवान के दर्शन कर शांति से अपने घर लौटता है, तो उसकी आत्मसंतुष्टि ही मेरी असली कमाई है।” इसी पवित्र सोच ने उन्हें एक साधारण व्यापारी से ऊपर उठाकर एक आध्यात्मिक मार्गदर्शक बना दिया।

Char Dham Yatra Uttarakhand

‘धोती वाला बाबा’: सादगी और शुचिता का पर्याय

जैसे-जैसे सफलता बढ़ी, शिवचरण जी और अधिक सरल होते गए। सफेद स्वच्छ धोती, चेहरे पर सौम्य मुस्कान और हर किसी की मदद को तत्पर हाथ—यही उनकी पहचान बन गई। ऋषिकेश की जनता और देशभर से आने वाले श्रद्धालु उन्हें प्यार और सम्मान से ‘धोती वाला बाबा’ पुकारने लगे। उन्होंने सिद्ध किया कि सादगी ही सबसे बड़ा आभूषण है। 55 वर्षों के लंबे अंतराल में उन्होंने 2 लाख से अधिक पुण्य आत्माओं को चारधाम से लेकर कन्याकुमारी तक की सुरक्षित यात्रा कराई। उनके लिए हर यात्री केवल एक ग्राहक नहीं, बल्कि उनके परिवार का अटूट हिस्सा था।

विरासत का नया सूर्योदय: देवव्रत अग्रवाल का वैश्विक विजन

सफलता की परिभाषा समय के साथ बदलती है, लेकिन मूल संस्कार वही रहते हैं। ‘धोती वाला बाबा‘ द्वारा बोया गया सेवा का यह बीज आज एक विशाल वटवृक्ष बन चुका है। लाला जी के इन पुण्य कार्यों में उनके बेटे लक्ष्मी नारायण और भगवान दास ने हर कदम पर कंधे से कंधा मिलकर मजबूती प्रदान की। आज इसकी बागडोर स्व-लालजी के बेटे भगवान दास अग्रवाल और पोते देवव्रत अग्रवाल के ओजस्वी हाथों में है।

देवव्रत न केवल अपने दादाजी के सिद्धांतों को संजो रहे हैं, बल्कि आधुनिक युग की तकनीकी संभावनाओं के साथ एक नया सेतु भी बना रहे हैं। वे कहते हैं, “हमारे दादाजी के लिए यह संस्था केवल एक नाम नहीं, बल्कि लाखों लोगों का विश्वास थी। आज हम उसी समर्पण को अक्षुण्ण रखते हुए, आधुनिक तकनीक और वैश्विक दृष्टिकोण के साथ इस सेवा को नई ऊंचाइयों पर ले जा रहे हैं।”

अंतरराष्ट्रीय क्षितिज पर भारतीय संस्कृति का शंखनाद

देवव्रत अग्रवाल की दूरदर्शिता का ही परिणाम है कि आज ‘श्री शिव शंकर तीर्थ यात्रा‘ के पंख पहले से कहीं अधिक व्यापक हो रहे हैं। उनका मानना है कि भारत के आध्यात्मिक वैभव को सात समंदर पार तक पहुँचना चाहिए।

  • क्षेत्रीय से अंतरराष्ट्रीय विस्तार: भारत के हर पवित्र कोने और दक्षिण एशिया के पड़ोसी देशों में अपनी मजबूत पकड़ बनाने के बाद, अब देवव्रत के नेतृत्व में संस्थान यूरोपीय देशों की ओर कदम बढ़ा चुका है।
  • सांस्कृतिक राजदूत: उनका लक्ष्य स्पष्ट है—भारतीय तीर्थाटन की समृद्ध परंपरा को वैश्विक स्तर पर एक नई और गौरवशाली पहचान दिलाना। वे उन श्रद्धालुओं के लिए विशेष व्यवस्थाएं कर रहे हैं जो विदेशी भूमि पर भी भारतीय संस्कार और सात्विक वातावरण की तलाश में रहते हैं।
  • परंपरा और तकनीक का संगम: जहाँ एक ओर दादाजी के ‘धोती वाला बाबा’ वाले सादगी भरे मूल्य सर्वोपरि हैं, वहीं दूसरी ओर डिजिटल प्लेटफॉर्म्स, ऑनलाइन बुकिंग और रियल-टाइम ट्रैकिंग के माध्यम से यात्रा को और अधिक सुगम बनाया जा रहा है।
श्री शिव शंकर तीर्थ यात्रा

आधुनिक तीर्थाटन: श्रद्धा, सुविधा और सुरक्षा

आज 60 वर्षों के बाद, यह संस्थान तीर्थयात्रियों के लिए भरोसे का दूसरा नाम है। कोविड-19 के बाद की चुनौतियों को स्वीकार करते हुए, संस्थान अब स्वास्थ्य और व्यक्तिगत सुरक्षा पर विशेष ध्यान दे रहा है:

  • सुगम परिवहन: हवाई, सड़क और ट्रेन यात्रा के उत्कृष्ट विकल्प।
  • सात्विक आहार: यात्रा के दौरान घर जैसा शुद्ध और पवित्र भोजन।
  • आरामदायक आवास: बेहतरीन होटलों और शांत आश्रमों में रुकने की व्यवस्था

युवाओं के लिए एक दिव्य संदेश

आज की युवा पीढ़ी के लिए शिवचरण जी का जीवन और देवव्रत का विजन एक ‘प्रकाश पुंज‘ है। यह कहानी हमें सिखाती है कि:

  • संघर्ष से घबराएं नहीं: चने बेचने वाला हाथ भी भविष्य का स्वर्णिम इतिहास लिख सकता है।
  • ईमानदारी ही असली पूंजी है: जो इमारत झूठ पर खड़ी होती है वह गिर जाती है, लेकिन जो ईमानदारी पर टिकती है वह अमर हो जाती है।
  • विरासत का सम्मान: अपनी जड़ों और संस्कृति से जुड़े रहकर ही हम वैश्विक स्तर पर सफल हो सकते हैं।

‘श्री शिव शंकर तीर्थ यात्रा’ एक अमर यात्रा

लाला शिवचरण लाल अग्रवाल जी का जीवन इस बात की पुष्टि करता है कि “कर्म ही पूजा है।” ऋषिकेश के उस ठंडे चबूतरे से शुरू हुआ यह सफर आज अंतरराष्ट्रीय उड़ानों तक पहुँच चुका है। ‘धोती वाले बाबा‘ आज हमारे बीच उस प्रेरणा के रूप में जीवित नहीं हैं। जो कहती है कि अगर आपके इरादों में गंगा जैसी पवित्रता है, तो दुनिया का कोई भी शिखर आपसे दूर नहीं है। देवव्रत अग्रवाल के नेतृत्व में ‘श्री शिव शंकर तीर्थ यात्रा’ का भविष्य न केवल उज्ज्वल है, बल्कि यह करोड़ों भारतीयों के गौरव का प्रतीक भी है।

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Devvrath Agarwal

Devvrath Agarwal

Devvrath Agarwal is carrying forward the legacy of his forefathers in the pilgrimage travel business. Following in the footsteps of Shiv Charan Lal Agarwal, he continues to organize well-managed Tirth Yatras, ensuring pilgrims receive the best facilities, spiritual guidance, and a seamless journey. With a commitment to tradition and service, he upholds the values of dedication and honesty that have been the foundation of this sacred mission for decades.