चने बेचकर संवारी जिन्दगी
पचास साल पहले लक्ष्मण झूला पर बंदरो को खिलाने के लिए चने बेचने वाले आज देश भर में कामयाब धार्मिक रेल तीर्थ यात्रा संचालक के रुप में जाने जाते हैं। उनकी श्री शिवशंकर तीर्थ यात्रा की प्रसिद्धि का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज देश भर में इससे मिलते जुलते नाम वाली 13 तीर्थ यात्रा संचालन में लगी है। संघर्षपूर्ण जीवन की मिसाल बने शिवचरण के लिए कामयाबी का यह सफर अनेक उतार-चढ़ावों से भरा रहा है। वह मानते हैं कि धार्मिक यात्रा संचालन का ध्येय पैसा कमाना नहीं, तीर्थ यात्री की संतुष्टि होना चाहिए।

आज से 48 साल पहले ऋषिकेश के लक्ष्मण झूले पर चने व धार्मिक पुस्तकें बेचने वाले शख्स लाला शिवचरण अग्रवाल अब पूरे देश में रेल के माध्यम से श्रद्धालुओं को तीर्थयात्रा कराने वाली श्री शिवशंकर तीर्थयात्रा के संस्थापक के रुप में जाने जाते है। हिण्डोन सिटी राजस्थान में घासीराम अग्रवाल के यहाँ 22 दिसम्बर 1932 को जन्मे लाला शिवचरण दो दर्जा पास है। पिता की गाँव में परचून की दुकान थी। पिता धार्मिक प्रवृत्ति के थे। जंगल से लकड़ी लाकर उसमें खिचड़ी बनाने के बाद वह उसे गरीबों में बांट देते थे। गाँव वाले उनके पिता को ताना मारते थे कि तुम लोंगो को खाना खिला रहे हो पर अपने बेटे के पेट की आग की तुम्हें चिन्ता नहीं है । लोगों के यह ताने शिवचरण के कानों में भी पड़ते थे। उन्होंने कड़ी मेहनत के बल पर आगे बढ़ने की ठानी और गाँव छोड़कर आगरा जा पहुॅचे। दो वर्ष तक आगरा में सब्जी की ठेली लगाने वाले शिवचरण लाल के ताऊ के लड़के रामधन प्रसाद ने उनकी आर्थिक सहायता की और 1959 में वह अपने दो पुत्रों लक्ष्मी नारायण और भगवान दास, पुत्री रुकमणि देवी व पत्नी संपति देवी को साथ लेकर ऋषिकेश आ गए। यहाँ टालवाली धर्मशाला के एक छोटे से कमरे में पूरा परिवार रहता था।

शिवचरण लाल ने 1960 में बंदरों को खिलाने के लिए चने बेचने का काम शुरु किया। उस वक्त लक्ष्मण झूला मार्ग स्थित लुरिंडा मंडी मे बस स्टैण्ड हुआ करता था। पुराने दिनों की याद करते हुए शिवचरण दास बताते है कि छोटे से कमरे में छह लोंगो के लिए जगह नहीं होती थी इसलिए समीप ही भारतीय स्टेट बैंक के चबूतरे पर वह रात गुजारा करते थे। एक साल बाद उन्होंने अपनी फेरी लगाकर धार्मिक पुस्तकें व धार्मिक तस्वीरें बेचने का काम शुरु किया ऋषिकेश में 1962 में उन्हें बस अड्डे में पुस्तक बेचने की स्टाॅल मिल गयी। पत्नी संपति देवी ने जीवन के हर संघर्ष में उनका साथ दिया। संपति देवी बारह घंटे एक ही आसन पर बैठकर फोटो में फ्रेम चढ़ाने का काम करती थी। बाद में चमेली माई धर्मशाला में कमरा लेकर उन्होंने धार्मिक पुस्तकें बेचने के काम को आगे बढ़ाया। धार्मिक प्रवृत्ति के शिवचरण लाल ने मुनिकीरेती स्थित संस्कृत महाविद्यालय में दो धमार्थ कमरों का निर्माण करवाया है। जब 1963 में रेलवे स्टेशन में उन्हें स्टाॅल मिली तो इसके बाद उनका काम आगे बढ़ता गया। हरिद्वार मार्ग स्थित पुरानी चुंगी पर उस वक्त बसें रुका करती थी। वह पत्नी क साथ दोनों कंधो पर बीस-बीस किलो की धार्मिक पुस्तकें लादकर सुबह चार बजे बस स्टैंड पहुॅंच जाते थे।

शिवचरण कहते हैं कि उस वक्त रेलवे स्टेशन पर स्पेशल टेन आती थी। पहली बार 1974 में उन्होंने स्पेशल तीर्थयात्रा के तहत रेल का एक डिब्बा बुक कराकर यात्रा पर भेजा, मगर पैंसो की कमी के कारण उन्हें काम बंद करना पड़ा। इसके बाद 1980 में स्वर्गाश्रम स्थित गीता आश्रम के संस्थापक स्वामी वेद व्यासानन्द महाराज ने स्पेशल टेन निकाली जिसमें उन्हें मैनेजर बनाकर यात्रा पर भेजा गया। बदले में उन्हें पन्द्रह हजार रु. मेहनताना मिला। इसी तरह 1981 में परमार्थ निकेतन ने स्पेशल यात्रा निकाली, इसमें भी उन्हें ही मैनेजर बनाकर भेजा गया। शिवचरण लाल बताते हैं कि गीता आश्रम द्वारा संचालित स्पेशल यात्रा मे दौरान उनका सम्पर्क दिल्ली के एक व्यापारी भगवान दास गोयल से हुआ। इस व्यापारी न उनका हौसला बढ़ाया। स्पेशल यात्रा संचालित करने के लिए पैसा तो दिया ही, यात्रियों की व्यवस्था भी की। तब से उनका काम चल पड़ा । आज पूरे देश में लाला शिवचरण लाल की धोती वाला बाबा के नाम से जाना जाता है। उनके द्वारा स्थापित श्री शिवशंकर तीर्थयात्रा ने इतनी ख्याति अर्जित की कि आज देश भर में शिवशंकर से मिलते जुलते नामों की 13 अन्य कम्पनियाँं संचालित हो रही है। उनके काम में हाथ बंटाने वाले उनके पुत्र भगवान दास ने बताया कि 42 वर्ष में अब तक हम दो लाख से अधिक लोगों को देश के विभिन्न तीर्थ स्थलों की यात्रा करा चुके हैं।

यात्रा पूरी तरह धार्मिक तरीके से करायी जाती है जिसमें यात्रियों को वैष्णव भोजन, सत्संग, भजन-कीर्तन, सामान्य चिकित्सा, धार्मिक स्थलों की पूर्ण जानकारी मुहैया कराई जाती है। वृद्ध तीर्थयात्रियों का विशेष ध्यान रखा जाता है जिसके लिए 16 व्यक्तियों की यात्रा में डयूटी लगाई जाती है। इतना ही नहीं, यात्रा के पड़ाव में यात्रियों के ठहरने की व्यवस्था और तीर्थ स्थल तक जाने के लिए बसों का भी प्रबन्ध किया जाता है। ....द्वारा बस से उत्तराखण्ड के चार धाम की यात्रा भी कराई जाती है। लम्बे संघर्ष के बाद इस मुकाम तक पहॅुचे लाला शिवचरण लाल अग्रवाल ने आज भी सादगी नहीं छोड़ी है आज भी वह पुराने दिनों को नहीं भूले हैं। आम आदमी की तरह उन्होंने चारपाई पर सोना नहीं छोड़ा है। उनका मानना है कि काम में ईमानदारी, निष्ठा, सेवा व समर्पण हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। हमारा ध्येय पैसा कमाना नहीं बल्कि तीर्थ यात्री की आत्म संतुष्टि है।